रणथम्भौर दुर्ग Ranathambhaur Durg |Ranathambhaur Fort | Ranathambhaur Kila

 रणथम्भौर दुर्ग Ranathambhaur Durg |Ranathambhaur Fort | Ranathambhaur Kila


अरावली एवं विन्ध्याचल की पहाड़ियों से घिरा दुर्ग रणथम्भौर बनावट के कारण अपना कोई सानी नहीं रखता । इसकी दुर्भद्यता एवं दुर्जेयता ने अनेक मुस्लिम शासकों को खुली चुनौती दी। दुर्ग वाली पहाड़ी के चारों ओर प्राकृतिक गहरी खाई है, प्राकृतिक पहाडियों एवं सघन वृक्षावली से घिरे दुर्ग को नहीं देखा जा सकता जबकि दुर्ग से काफी दूर तक चौकसी की जा सकती है। समुद्र तल से 1578 फीट ऊँचाई पर स्थित दुर्ग रणथम्भौर 26.2 उत्तर अक्षांश तथा 76.28 पूर्व देशान्तर के मध्य फैला है। पूर्व से पश्चिम 6.5 कि.मी. तथा उत्तर से दक्षिण लगभग 3 कि. मी. क्षेत्र में उसका विस्तार है । सुरक्षा की दृष्टि से बेजोड़ इस दुर्ग में जगह जगह पर तोप रखने एवं दुर्ग रक्षकों के स्थान बने हुए है जहाँ से काफी दूर तक सीधी मार की जा सकती है। राजस्थान के प्राचीन इतिहास में रणथम्भौर ही पहला ऐतिहासिक दुर्ग है, जहाँ दस हजार से अधिक वीरांगनाओं ने एक साथ जौहर किया । दुर्ग निर्माण का स्पष्ट उल्लेख कहीं नहीं मिलता है, कुछ इतिहासकारों का मानना है कि सपालदक्ष के चौहान राजाओं में एक राजा रणथम्भौर देव ने सन् 944 में इस दुर्ग को बनाया और उसी के नामानुसार इसका नाम रखा गया ।

Sawai madhopur Ranathambhaur Fort All Detail In Hindi


"रणथम्भौर का इतिहास" के अनुसार यह किला छोटे रूप में मूलतः जादौन राजपूतों की एक उपजाति टाटू क्षत्रियों द्वारा वि. सं. 1001 में बनवाया । कुवाल जी शिलालेख के अध्ययन से रणथम्भौर का निर्माण वर्ष सन् 944 ई. ज्ञात होता है, ऐतिहासिक आधारों, दंत कथाओं, चारणभाटों के ग्रन्थों और इतिहास की भूली बिसरी यादों से निष्कर्ष निकलता है कि दसवीं शताब्दी में यह दुर्ग अस्तित्व में था तथा इसका निर्माण किसी हिन्दू राजा ने ही करवाया था। चाहे व चौहान वंशी रहा हो या जादौन या गौड़वंशी । इतिहास में पृथ्वीराज चौहान के पुत्र गोविन्दराज से रणथम्भौर के शासक होने के प्रमाण मिलते है। जो इस प्रकार है : पृथ्वीराज, गोविन्दराज, बल्हणदेव, बागभट्ट, नाहरदेव जयत्रसिंह, राव हम्मीर देव


Sawai madhopur Ranathambhaur Fort History In Hindi

राव हम्मीर देव :


नाहर देव की मृत्यु के बाद उसका पुत्र जयत्र सिंह गद्दी पर बैठा । जयत्र सिंह ने रणथम्भौर पर 32 वर्ष तक शासन किया। इनकी मृत्यु के पश्चात उनका तीसरा पुत्र इतिहास प्रसिद्ध वीर हम्मीर गद्दी पर बैठा । इसका राज्याभिषेक 26 दिसम्बर 1281 माघ शुक्ला पूर्णिमा सम्वत् 1339 रविवार को हुआ । राज्य गद्दी पर अच्छी तरह स्थापित होने के बाद हम्मीर ने दिग्विजय के लिए प्रयास किये । कई राजा महाराजाओं, किलों और प्रदेशों को अपने अधीन कर लिया । अपने शासन काल में हम्मीर ने कई लड़ाईयाँ लड़ी दिल्ली के शासक अलाउद्दीन खिलजी के विद्रोही प्रमुख सैनिक सरदार मुहम्मद शाह को शरण देकर अभयदान दिया जिसे हम्मीर ने हर कीमत पर पूरा किया इसलिए प्रसिद्ध है कि

" सिंह गमन-संतपुरुष वचन, कदली फले इक बार । 

  तिरिया तेल, हम्मीर हठ चढ़े न दूजी बार ||"

खिलजी की विशाल सेना को गाजर मूली की तरह काट कर उनकी ध्वज पताका छीन कर खुशी मनाते हुए हम्मीर जब किले में लौटे तो उल्लास और विजय की खुशी में वह भूल गये कि उन्होंने दुर्ग रक्षकों से कहा था कि शाही झण्डियाँ आती दिखाई दे तो जौहर कर लिया जावे यदि हम जीतगे तो भगवा झण्डै फहराते हुए आयेंगे । रानियों ने शाही झण्डे देखकर जौहर कर लिया वह दिन था 10 जुलाई सन् 1301 सोमवार ।


जब सैनिकों सहित हम्मीर किलें में पहुँचे तो पछतायें विधाता की इस लीला को देख कर हम्मीर हत प्रभ रह गये, उन्होंने अपना शिर आराध्य देव भगवान शिव को समर्पित कर दिया ।


Sawai Madhopur Ranathambhaur Fort Dharshniy Isthal

दुर्ग दर्शन


नौलखा दरवाजा (Sawai madhopur Ranathambhaur Fort Naulakha Darvaja)


 यह दुर्ग का प्रवेश द्वार है। इसके सामने एक मोटी दीवार बनी हुई है जो सुरक्षा दृष्टि से उत्तम भवन निर्माण कला की परिचायक है ।

हाथी पोल (Sawai madhopur Ranathambhaur Fort Hathi Pol)


यह दुर्ग का दूसरा दरवाजा है । कहा जाता है कि इसके सामने विशाल चट्टान पर एक हाथी और महावत की मूर्ति थी, जो इस दरवाजे के लिए रोधक और आड़ का काम भी करती थी। बाद में मुस्लिम सैनिकों ने इसे तोड़ दिया।

गणेश पोल (Sawai madhopur Ranathambhaur Fort Ganesh Pol)


यह दुर्ग का तीसरा दरवाजा है यहाँ छतरी बना कर गणेश देव की प्रतिष्ठा की गई है, जो इस दीवार के प्रहरी और स्वामी माने जाते हैं। इस दरवाजे के भीतर से एक सुरंग दुर्ग के भीतरी भागों में जाती है । जो रनिवास के पास स्थित एक मन्दिर में निकलती है। वर्तमान में यह बन्द है ।

तोरणद्वार (अंधेरी दरवाजा) (Sawai madhopur Ranathambhaur Fort Andheri Darbaja)


 इस दरवाजे को चौहान काल में तोरण द्वार मुस्लिम काल मे अंधेरी दरवाजा तथा जयपुर शासकों के समय में त्रिपोलिया द्वार आदि नामों से पुकारा जाता रहा था । द्वार प्रवेश के बाद सामने द्वार से एक रास्ता सीधा सुरंगनुमा होकर राजभवन को जाता है, दायीं तरफ का मार्ग तिरछा सात मेंहराबों से मिलकर सुरंगनुमा बनाया गया है। ताकि कदम-कदम पर दुश्मन को आगे बढ़ने से रोका जा सके इसमें एक गुप्त सुरंग बनी हुई है।

बत्तीस खम्भों की छतरी (Sawai madhopur Ranathambhaur Fort 32 Khabh Ki Chatri)


इस 36 फुट उंची 32 खम्भों की विशाल छतरी का निर्माण प्रतापी राजा राव हम्मीर ने सन् 1280 में अपने पिता जयत्र सिंह की मृत्यु के बाद उनकी समाधि पर करवाया था । जयत्र सिंह ने इस किले पर 32 वर्ष तक शासन किया । उन्हीं के प्रतीक स्वरूप यह 32 स्तम्भों की छतरी बनायी गई । सामने फव्वारों का सुन्दरकुण्ड तथा छतरी के नीचे की तरफ विशाल शिव लिंग की स्थापना की गई ।


अधूरा स्वप्न बत्तीस खम्भों की छतरी के पश्चिम में लाल पत्थरों से अधूरी निर्मित छतरी का चबूतरा हुआ है । एक शिलालेख के अनुसार महाराणा साँगा की हाड़ी रानी कर्मवती नें इसे बनवाना शुरू किया था। (सन् 1516 से 1527 के मध्य) लेकिन रानी द्वारा अचानक चित्तौड़गढ़ चले जाने के कारण उनका यह निर्माण स्वप्न अधूरा ही रह गया। यह वहीं हाड़ी रानी है जिसने बादशाह हूमायूँ को राखी भेजी थी । चौहानों के महल: छतरी के पास ही खुले मैदान में जो विशाल भवन है वह हम्मीर महल के नाम से

जाना जाता है । 7 खण्डों में निर्मित इस महल के 4 खण्ड जमीन के अन्दर तथा 3 खण्ड बाहर हैं महल के गर्भगृह में शिव मन्दिर, भैरव मन्दिर, रसद शालाएं, शस्त्रागार, पाठशालाएं तथा बड़े-बड़े बरामदें बनें हुए हैं। तीसरे खण्ड के बरामदेनुमा कक्ष से दूर-दूर तक दुर्ग की प्राचीरों और पहाड़ियों को आसानी से देखा जा सकता है । इस महल से रानी महल तथा कई महत्वपूर्ण स्थानों तक सुरंगे हैं । यह महल खण्डहर में तब्दील होता जा रहा है तथा वर्तमान में बन्द रहता है ।

रानी महल (Sawai madhopur Ranathambhaur Fort Rani mahal)


यह वही महल है जहाँ 10 जुलाई 1301 के दिन हठी हम्मीर की खिलजी पर विजय के •बावजूद शाही झण्डियां देखकर रानियों ने बारूद बिछा कर अपने आपको अग्नि के हवाले कर दिया था। इस महल की केवल द्वार आकृति ही दिखाई देती है । पद्मला: रानी महल के पीछे एक सरोवर है जिसे पदमला तालाब कहते हैं । दुर्ग निर्माण काल में ही किसी शासक ने इसका निर्माण करवाया होगा। राव हम्मीर की इकलौती पुत्री पद्मला ने अपनी लाज बचाने हेतु इस सरोवर में कूद कर प्राणोत्सर्ग किया था । गणेश मन्दिर: दुर्ग के कंगूरे पर निर्मित यह गणेश मन्दिर पूरे देश में प्रसिद्ध है । यहाँ त्रिनेश गणेश जी की मुख प्रधान प्रतिमा है। चौहानवंशी राजा हम्मीर की रानी एवं पुत्री प्रतिदिन थाल सजाकर इनकी उपासना करती थी। उनके समय से ही भाद्रपद शुक्ल गणेश चतुर्थी को यहां मेला लगाया जाता था, जो आज भी चल रहा है ।

गुप्त गंगा (Sawai madhopur Ranathambhaur Fort Gupt Ganga)


समुद्रतल से 2000 फीट ऊँचाई पर अटूट जल भण्डार होना कम आश्चर्य की बात नहीं है, यह गुप्त शीतल पेयजल का भण्डार है। इसमें से कितना ही पानी निकाल दीजिए पर फिर भी पानी की कमी नहीं आती। युद्ध के तालाबों का पानी दूषित कर दिया जाता था। ताकि दुश्मन उसका उपयोग न कर सके ऐसे में परिचितों के लिए गुप्त जल भण्डारण की व्यवस्था गुप्त गंगा से ही की जाती थी । इस गुफा में घुमावदार सीढ़ियों के सहारे जाना पड़ता है यहां गंगा मन्दिर भी है। यहां जाने के लिए टार्च साथ में ले जाना चाहिए।

शिव छतरी (Sawai madhopur Ranathambhaur Fort Shiv Chatari)


दुर्ग के पूर्वी द्वार सूरज पोल के पास 25 फीट के चबूतरे पर 32 स्तम्भों की एक छतरी है। इसमें एक विशाल आकर्षक शिवलिंग जलहरी के मध्य स्थापित है, एक शिलालेख के अनुसार संवत् 1667 में इनका निर्माण किसी राजा की समाधि पर करवाया गया था। 

जंवरा-भंवरा (Sawai madhopur Ranathambhaur Fort Janvra Bhanvra)


गुप्त गंगा से थोड़ा आगे चलने पर लम्बे चौड़े कमरों वाली इमारतें जंवरा - भंवरा है। ये यहाँ के शासकों के अन्न एवं खाद्य सामग्री के भण्डार रहे थे इन गोदामों में हजारों मन गल्ला एवं युद्ध के समय रसद सामग्री एकत्रित की जाती थी। इनका निर्माण 12वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में चौहान

राजाओं द्वारा करवाया गया था।

बादल महल (Sawai madhopur Ranathambhaur Fort Badal Mahal)


 यह यहाँ के शासको की मनोरम रंगशाला थी, यहाँ नृत्यागनाएं नृत्य करती थी. शराब और शबाब की महफिलें जमती थी । चौहान नरेश अपने सामंतों और सभासदों के साथ बैठकर आमोद प्रमोद करते थे।

हम्मीर कचहरी (Sawai madhopur Ranathambhaur Fort Hammir Kachahari)


 बादल महल से दिल्ली गेट की ओर जाने पर हम्मीर की न्यायशाला स्थापित है चौहान कालीन निर्मित यह भवन बड़ा विशाल एवं सुदृढ़ है। पश्चिमी छोर पर स्थित यह भवन पूर्णतः सुरक्षित एवं दर्शनीय है।

इनके अतिरिक्त दुर्ग में दरवेश की दरगाह, काली मन्दिर, दिल्ली गेट, शिवमन्दिर आदि दर्शनीय स्थल है।

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