बाघों की नगरी सवाई माधोपुर (Tiger city Sawimadhopur) | All Details of Sawai madhopur |

 बाघों की नगरी सवाई माधोपुर (Tiger city Sawimadhopur) | All Details of Sawai madhopur |


सवाई माधोपुर शहर की बसावट बहुत प्राचीन नहीं है। जयपुर की बसावट के बाद 1767ई. में जयसिंह के भाई माधोसिंह प्रथम द्वारा रणथम्भौर प्राप्त करने के बाद अपने ही नाम से इस शहर की नींव डाली गई। सवाई माधोपुर में प्राचीन आबादी आलनपुर है। शहर का निर्माण हो जाने पर शहर में लोगो को बसाने के लिए शेरपुर व आलनपुर से लाया गया था। शहर में रहने वाले प्रमुख व्यवसायियों अलावा विभिन्न कलाओं को कारीगर शेरपुर के ही मूल निवासी थे।

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रणथम्भौर सवाई माधोपुर की शान एवं पहचान है रणथम्भौर दुर्ग पश्चिम रेल्वे के दिल्ली-मुम्बई मार्ग पर स्थित सवाई माधोपुर रेल्वे स्टेशन से 14 मि. मी. दूरी पर अरावली विध्यांचल पर्वतमालाओं के बीच 481 मीटर की ऊँचाई पर एक सुरक्षित अण्डाकार पहाड़ी पर बना हुआ है। विद्वानों के अनुसार 944ई. के लगभग सपाल दक्ष के चौहानों ने इस दुर्ग का निर्माण करवाया। उस चौहान नरेश का नाम रणथम्भन देव था। जिसका राज्यकाल अज्ञात है। सम्भवतः उसी के नाम पर दुर्ग का नामकरण हुआ हो।

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रणथम्भौर दुर्ग की ख्याति का प्रमुख श्रेय हम्मीर देव चौहान को जाता है। जिसके कारण आज भी इस धरती को हम्मीर हठी की धरती कहा जाता है। हम्मीर जयत्रसिंह का तीसरा पुत्र था। अपनी विशिष्ट प्रतिभा के कारण अपने पिता की मृत्यु के बाद 1282 ई. में गद्दी पर बैठा। शासन की बागडोर संभालने साथ उसने राज्य विस्तार का कार्य प्रारम्भ किया। इस कड़ी में उसने भीमसर के शासक अर्जुन को परास्त कर माण्डलगढ़ से कर वसूल किया। दक्षिण में परमार वंश के शासक राजा भोज को पराजित कर उज्जैन तथा धार पर अधिकार जमा लिया था। रणथम्भौर लौटते हुए उसने चित्तौड़, आबू, वर्द्धनपुर, पुष्कर, खण्डेला, चम्पा और कंकरिला आदि को जीतकर वहाँ के शासकों को परास्त कर अपना अधिकार जमा लिया था। थोडे ही समय में उसने शिवपुर जिला (ग्वालियर) बलवन (कोटा) शाकम्भरी को अपने अधीन कर मेवाड़ के शासक समरसिंह को परास्त कर राजस्थान में प्रभुत्व जमा लिया था। कहते है हम्मीर ने अपने जीवनकाल में सत्रह युद्ध लड़े तथा सभी में विजय प्राप्त की।


अपने समय में रणथम दुर्ग शान का प्रतीक माना जाता था। 1301 ई. में अलाउद्दीन खिलजी ने इस दुर्ग को अपने अधीन कर लिया था। इसकी मृत्यु के उपरान्त मोहम्मद बिन तुगलक राणाकुम्भा, मालवा के शासक महमूद खिलजी, राणा सांगा, बहादुर शाह, शेरशाह, अकबर, जहाँगीर, शाहजहाँ, औरंगजेब के बाद अहमदशाह तक यह दुर्ग मुगलों के नियंत्रण में रहा। सवाई माधोसिंह जी को दिल्ली के बादशाह की ओर से यह दुर्ग 1758 ई. में प्राप्त हुआ। तब से 1949ई. तक यह दुर्ग जयपुर नरेशों के हाथों में रहा और आज भी पुरातत्व विभाग के अधीन है।


सवाई माधोपुर (Sawai Madhopur)


आज सवाई माधोपुर की पहचान रणथम्भौर दुर्ग की वजह से कम बल्कि रणथम्भौर राष्ट्रीय उद्यान के कारण अधिक है। आज दुनिया में बाघ को जितने सुविधाजनक तरीके से यहाँ देखा जाता है। वैसा अन्य कहीं भी संभव नहीं है। इसीलिए पूरी दुनिया से पर्यटक यहाँ बाघ को देखने आते है। पिछले वर्षों में यहाँ के पर्यटन में होटलों की बाढ़ आ गयी है जिसमें ऑबेरोय, ताज व अमनबाग जैसी अंतराष्ट्रीय होटल समूह ने पूरी दुनिया में अपनी यहाँ की अलग पहचान दी है। ऐतिहासिक धार्मिक एवं दर्शनीय स्थलों की दृष्टि से स. मा. का अपना विशेष महत्व है।


प्राकृतिक सुषमा और भक्ति की सुरसरी से सराबोर नव महेश्वरों की महिमा निम्नानुसार है।

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1. अमरेश्वर (Amreswar)


रणथम्भौर के मार्ग में स. मा. से 7 कि.मी. की दूरी पर दाहिनी ओर दो पर्वतों के बीच ऊँचाई से गिरते झरने का जल नीचे कुण्ड में एकत्रित होकर फिर उनके धाराओं में बहता है। वर्षाकाल में यह स्थान दर्शकों को स्वर्गानुभूति करवाता है। यहाँ शिवलिंग पर वर्ष भर पहाड़ से जल गिरता रहता है। जिसकी विशेषता यह कि सर्दी व वर्षा ऋतु में यह बूंद-बूंद गिरता है। जबकि गर्मी के दिनों में धार गिरती है।

2. शोलेश्वर (sholeswar)


रणथम्भौर के दक्षिण में 5 कि.मी. दुर्गम घाटियों एवं घने जंगलो वन्य जीवों के निवास स्थल के रूप में विख्यात यह स्थान हर दर्शक को रोमांचित करता है। यहाँ शंकर का प्राचीन शिवलिंग है।


3. केलेश्वर (keleswar)


सवाई माधोपुर शहर के दक्षिण-पश्चिम में लगभग 4 कि.मी. की दूरी पर जमीन से 200 मीटर की ऊँचाई पर यह स्थान स्थित है। प्रकृति की नैसर्गिक छटा से परिपूर्ण यहाँ गौमुख से कुण्ड में पानी गिरता रहता है।

4. गोरेश्वर (Goreswar)


दुर्ग के पहले मोड़ अथवा शहर स्थित खवासजी के बाग से पहाड़ी चढ़ाई को पार करके इस स्थान पर पहुँचा जा सकता है। पर्वतीय गुफा में एक शिव मन्दिर है। वर्षाकाल में इस स्थान की छटा दर्शनीय होती है।

5.भूतेश्वर (Bhooteswar)


वर्तमान में सर्किट हाउस के पीछे स्थित भूतेश्वर तंत्र विद्या के शिवोपासको का प्रमुख केन्द्र रहा है। इसके प्राचीन रूप को समाप्त कर नया रूप दे दिया गया है।

6. कॅवलेश्वर (केलकवाल जी) (Qwaleswar)


सवाई माधोपुर की सीमा पर स्थित यह मध्यकालीन तीर्थ है। नगर शैली के ऊँचे शिखर वाले इस मन्दिर का निर्माण हम्मीर के पिता जयत्रसिंह ने वि. सं. 1345 में चाखन नदी के तट पर करवाया था। यह मन्दिर सवाई माधोपुर से 45 किलोमीटर दूर है इसे मिनी खजुराहो भी कहते है। मंदिर दर्शनीय है। यह 6–7 शताब्दी के बने हुए बताये जाते है यहाँ 2 मंदिर शेष है जिसमें एक तो पूरी तरह खण्डहर में तब्दील हो गया है जिसे खण्डदेवरा के नाम से जाना जाता है परन्तु मुख्य श्री शिवमंदिर देखने योग्य है। यहाँ पर पत्थरों को तराशकर विभिन्न मुद्राओं में योग, आसन, संगीत कला को विभिन्न मूर्तियों को दिखाया गया है। आस-पास विभिन्न देवी देवताओं की मूर्तियां विराजमान है तथा हाथी, घोड़े, बाघ एवं अन्य जीव जन्तु, पक्षियों की लयबद्ध मूर्तियाँ है पास ही रणथम्भौर बाद्य परियोजना के पर्यटन क्षेत्र के जोन 9 का प्रवेश द्वार है। आस्था एवं विश्वास के चलते यहाँ के कुण्डों में स्नान करने से कुष्ठ एवं चर्म रोगों से मुक्ति मिलती है ।

7. झोझेश्वर (Jhojeswar)


सवाई माधोपुर से 20 किलोमीटर दूर लहसोड़ा मार्ग पर चलकर इस स्थान पर पहुँचा जा सकता है। वर्षा ऋतु में लगभग 100 फिट की ऊचाई से गिरते अनेक झरनों का दृश्य अत्यन्त मनोर होता है। शिवलिंग प्राचीन है।

8. रामेश्वर (Rameswar)


खण्डार से लगभग 20 किलोमीटर दूरी पर चम्बल बनास और सीप नदी के संगम पर सवाई माधोपुर व मध्यप्रदेश की सीमा पर यह स्थान स्थित है। यहाँ प्राचीन श्रीराम मन्दिर व शिवलिंग है। परशुराम घाट पर स्थित चतुर्भुज नाथ का मन्दिर भी जन आस्था का केन्द्र है। यह नौका भ्रमण का अच्छा स्थान है। कार्तिक पूर्णिमा पर मेला लगता है।

9. घुश्मेश्वर (Ghusmeshwar)


द्वादश घुश्मेश्वर ज्योर्तिलिंग स. मा. जयपुर रेल्वे मार्ग पर ईसरदा स्टेशन से उत्तर में 3 कि.मी. की दूरी पर शिवाड़ नामक गाँव में स्थित है। यहाँ समीप के पहाड़ पर कृत्रिम अमरनाथ गुफा एवं द्वादश ज्योर्तिलिंग पर्यटन की दृष्टि से अत्याधिक आकर्षण के केन्द्र हैं। प्राचीन शिवलिंग जन आस्था का केन्द्र है।

10. काला- गौरा मन्दिर (Kala Gora Mandir)


सवाई माधोपुर शहर का प्रमुख दर्शनीय स्थल काला-गौरा भैरव मन्दिर है। शहर के मुख्य प्रवेश द्वार में प्रवेश करते ही दाहिनी ओर 100 फिट की ऊँचाई पर पर्वतमालाओं की बुलन्दियों को छूता यह मन्दिर वामाचारियों की तान्त्रिक साधाना का अत्यन्त प्राचीन स्थान रहा है।

11. जैन मन्दिर (चमत्कार जी का मंदिर) (Chamatkar ji jain mandir)


सवाई माधोपुर में जैन मतावलंबियों के अनेक प्राचीन मंदिर है। जिसमें अतिशय क्षेत्र चमत्कार जी के अलावा शहर में 7 बड़े विशाल जैन मन्दिर हैं। जिनमें हस्तलिखित धर्मग्रन्थों का अच्छा संकलन है।

12. चौथ माता मन्दिर (Choth Matha Mandir)


सवाई माधोपुर के पास अन्य दर्शनीय स्थानों में चौथमाता (चौथ का बरवाड़ा) है जो स.मा. जयपुर रेलमार्ग पर 25 कि.मी. की दूरी पर स्थित है। 1000 फिट ऊँची पहाड़ी चोटी पर बना हुआ भव्य मन्दिर दूर से ही सब को अपनी ओर आकर्षित करता है। वर्ष भर यहाँ श्रद्धालुओं का तांतालगा रहता है।

13. भगवतगढ़ के कुण्ड (Bhagavatgadh ke kund)


पुराणों में वर्णित नाथ सम्प्रदाय की सिद्ध पीठ के रूप में सुविख्यात अर्णेश्वर महादेव की तपो भूमि स.मा के पश्चिम में 25 कि.मी. की दूरी पर भगवतगढ़ कस्बे के समीप स्थित है। यहाँ छोटे-बड़े सात कुण्ड है। कदम्ब वन से घिरा यह स्थान प्राकृतिक सुषमा से परिपूर्ण है। 

14. सीतामाता (SeetaMata)


सवाई माधोपुर शहर में सामान्य चिकित्सालय के पास जाने वाले मार्ग पर लगभग 4 कि. मी. की दूरी पर पहाड़ी के मध्य में यह स्थान स्थित है। यहाँ सीता माता जी का मन्दिर है। प्राकृतिक सुषमा का यहाँ भण्डार है। 

15. खटोला (Khatola)


सवाई माधोपुर से खण्डार मार्ग पर 32 कि. मी. की दूरी पर मेईकलां ग्राम के पश्चिम में 6 कि.मी. की दूरी पर पहाड़ी भू-भाग में पगडंडी मार्ग से खटोला नामक स्थान पर पहुँचा जा सकता है। पहाड़ो में स्थित यह स्थान अत्याधिक सुन्दर है। यहाँ गौ मुख से शिवलिंग पर जलाभिषेक होता रहता है। पास ही पंचमुखी हनुमान प्रतिमा के दर्शन होते है।

16. झरेल (Jharel ka balaji)


 सवाई माधोपुर शहर से पाली जाने वाले मार्ग पर 25 कि.मी. की दूरी पर चम्बल नदी के बीच में यह स्थान स्थित है। चम्बल नदी के बीच में स्थित श्री हनुमान जी का मंदिर आस्था का केन्द्र है। धार्मिक स्थान के साथ ही यहाँ पिकनिक का आनन्द लिया जा सकता है। 

17. खण्डार दुर्ग (Khandar fort)


सवाई माधोपुर के पूर्व में 40 किलोमीटर की दूरी पर स्थित मध्यकालीन तारागढ़ दुर्ग को आजकल "खण्डार का किला" कहा जाता है। इसे किसने बनाया यह आज अज्ञात है। पर इतना निश्चित है कि 12वीं शताब्दी में अपने पूर्ण वैभव पर था। यूँ तो इसके भाग्य का फैसला सदैव रणथम्भौर से जुड़ा रहा था। किन्तु अपने विशिष्ट सामरिक महत्व उन्नत व्यूह रचना, अनूठे स्थापत्य, सुदृढ और गर्वोन्नत प्राचीर विशाल शस्त्रागार, गुप्त संकट कालीन मार्ग, जलपूर्ति के लिए मोहक कुण्डों के कारण आज भी इसका आकर्षण बरकरार है। इसे रणथम्भौर का सुरक्षा प्रहरी के नाम से जाना जाता है। सवाई माधोपुर वस्तुतः रणथम्भौर की ही देन है मध्यकालीन इतिहास में रणथम्भौर जहाँ शौर्य बलिदान, जौहर, हम्मीर हठ और विशिष्ट दुर्ग संरचना के लिए इतिहास में गौरवपूर्ण स्थान बनाए हुए हैं।


वहीं दूसरी ओर अरावली व विंध्याचल पर्वतमालाओं के मध्य वर्ष पर्यन्त प्रवाहित करने वाली चम्बल और बनास नदियों से संवारा गया अनुपम प्राकृतिक सौंदर्य, जैव विविधता और वन्यजीवों का स्वतन्त्र विचरण पर्यटकों के लिए आकर्षण का केन्द्र बना रहता है। 

18. सूरवाल तालाब  (Soorwal talab)


 13 किमी बांध खेतों एवं गांवों के आस-पास है। बाघ का भराव के बाद 20 Sq. किमी है। रणथम्भौर से नजदीक होने की वजह से देशी एवं विदेशी पक्षी के लिये अच्छा वातावरण है। यहां पानी, दलदल, घास एवं पहाड़ी पर पाये जाने वाले पक्षी देखे जा सकते हैं। जैसे- पलेभिगो पैलिकान, टर्न, गीज, ठीकनी, सेन्ड ग्राउस इत्यादी ।

19. कृष्ण मृग (Balck Buck )


 सवाई माधोपुर से 13-20 किमी दूर कृष्ण मृग पाये जाते है इनको काले हिरण या Black Buck के नाम से भी जाना जाता है। यह रणथम्भौर नेशनल पार्क में नहीं पाया जाता क्योंकि इसको खुले मैदान में रहना पंसद है। यह बहुत तेज दौड़ने वाला प्राणी है। नर के करीब 2 फीट के सींग होते है। ऊपर से काला रेग एवं आंखो पर सफेद गोला एवं पेर सफेद होता है। मादा के सींग नहीं होते है एवं सुन भूरा रंग होता है।

20. मानसरोवर बांध (Mansarovar dam)


यह सवाई माधोपुर से 25 किमी दूर है। यह जयपुर नरेश द्वारा बनवा गया बांध है जिसका पानी सिंचाई के लिये काम में लिया जाता है। पूर्व में यहा मत्स्य पालन एवं आखेट का भी प्रबन्ध था, परन्तु रणथम्भौर नेशनल पार्क की सीमा में आने के कारण मछली शिकार पर पूर्णतः रोक है। चारो ओर अरावली एवं विध्यांचल पहाडी का दृश्य है यहा विभिन्न प्रकार के पक्षी के लिये उपयुक्त वातावरण है, एवं वन्य जीव के भी यहा देखे जा सकते है। प्राकृतिक मनोहारी दृश्य है। पक्षी-ग्रेहेडउ फीस ईगल, ओस प्रे, ओविल बील स्ट्रोक, ब्लेक स्ट्रोग, लार्क एवं पीथीट इत्यादी ।


21. भूरी पहाड़ी (आमली दह) (bhoori pahadi)


यह सवाई माधोपुर से 38 किमी दूर है। यहां बनास नदी एवं मोरेल नदी का संगम है जिससे एक किलोमीटर का नदी को चौड़ाई है। यह वर्शाजनित नदी होने के कारण ज्यादातर समय कम पानी होने की वजह से यहां रेगिस्तान, पानी, वन की मिश्रत आनन्द लिया जा सकता है। विभिन्न स्थानों पर नौकायान एवं ऊंट (ऊंट गाड़ी) का आनन्द लिया जा सकता है। यहां एडवेंचर ट्यूरिज्म की असीम सम्भव जगह जहां मोटर साईकिल लीग, वोटिंग की जा सकती है। 

22. पाली घाट  (Pali Ghat)


 यह सवाई माधोपुर से 38 किमी दूर है। इसके एक ओर चम्बल नदी है। जो राजस्थान और मध्यप्रदेष की सीमा तय करती है। यह उत्तरी भारत की विशाल नदियों में से एक है। यहाँ मगरमच्छ की मगर प्रजाति एवं घड़ियाल की प्रजाति के अतिरिक्त विभिन्न दुर्लभ प्रजाति की पक्षी भी देखे जा सकते हैं। यहां का विशाल पुल भी आकर्षण का केन्द्र है। यहा राजस्थान वन विभाग एवं प्राईवेट नौकायान सुविधा भी उपलब्ध है, यह क्षेत्र घडियाल सेन्चुरी क्षेत्र में आता है। पक्षी - स्कीमर, ब्लेड हेडड गल, कामन गल, सोसलएवील लेप बिग य लो लेपविंग, रिवर लेपविंग।

23. रामेश्वरम्  (Rameshwar )


यह सवाई माधोपुर से 65 किमी दूर है। रामेश्वर त्रिवेणी संगम (तीन नदियों का संगम) स्थल है, जहां चम्बल, बनास एवं सीप नदी मिलती है। त्रिवेणी होने की वजह से यह एक पवित्र धार्मिक स्थल भी है यहां चतुर्भुज विष्णु भगवान का प्राचीन मन्दिर है जिसमें 250 वर्षों से अखण्ड ज्योति एवं 30 वर्षो से अखण्ड (निरन्तर) र्कीतन चल रहा है। नदी के दूसरी ओर (म.प्र.) अति प्राचीन शिव, हनुमान मन्दिर एवं बावड़ी देखने लायक है। यहां नौकायान की सुविधा है। पर्यटक यहां के विशाल घाट एवं विभिन्न प्रकार के पक्षी एवं मगरमच्छ देखने जाते है।


पक्षी - रेड ऐवेडेन्ट, इजावेलाईन बिटईयर, क्रस्टल, स्पेरोहोक, केन्टीष प्लोवर, ब्राइविल सेन्डपाइपर।

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